तुझे भूलने की ख़लिश में कमी नहीं है
देखा तेरा चेहरा मगर आँखों में नमी नहीं है
तकदीर बहाने लेकर आई होगी क़म्बख्त
रूह से उतर जाने की बात की जमीं नहीं है
एक टुकड़ा आसमान का हो जाता मगर
चमकते चाँद की बगावत अभी थमी नहीं है
तन्हाईयों से सौदेबाजी कर के निकले हैं
मेरे घर की छत से तेरी बस्ती दिखती नहीं है।।
ख़लिश

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